गोरखपुर । दर्पण द्वारा आयोजित संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से संस्कार भारती गोरक्ष प्रान्त एवं भारतेंदु नाट्य अकादमी,लखनऊ उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में पद्मश्री स्मृतिशेष बाबा योगेंद्र जी एवं स्मृतिशेष अमीरचंद जी को समर्पित "नेपथ्य के नायक " पर आधारित 28 सितम्बर से 05 अक्टूबर तक चलने वाले आठ दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन महायोगी बाबा गम्भीर नाथ प्रेक्षागृह में प्रोफेसर ईश्वर चंद विश्वकर्मा पूर्व विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग दी द उ गो विश्वविद्यालय ,जी द्वारा बाबा योगेंद्र जी एवं अमीरचंद जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। साथ मे वरिष्ठ रंगकर्मी दीप शर्मा ,प्रदीप सुविज्ञ,आदि रहे । संस्था के अध्यक्ष रविशंकर खरे ने प्रोफेसर ईश्वर चंद विश्वकर्मा को पुष्प गुच्छ देकर स्वागत सहित उपस्थित दर्शको का अभिवादन किया।ईश्वर चंद विश्वकर्मा का उद्बोधन- सभी नाटक चेतना को नमन करते हुए प्रोफेसर साहब ने बाबा योगेंद्र एवं अमीर चंद जी के योगदान को ऋषि भृतहरि द्वारा कहे गए एक उदाहरण से दिया कि- फूल के गुच्छे की दो गति होती है या तो उसकी माला बनती या नही तोड़ा गया तो फूल से फल बनकर वही भूमि में खुद को तर्पण कर देता है ताकि वह नया वृक्ष बन सके ।साथ ही झारखंड की स्वतंतन्त्रता आंदोलन में अमूल्य योगदान पर मंचित नाटक उलगुलान पर प्रकाश डाला।झारखंड की अस्मिता,सांस्कृतिक विरासत और औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष की कहानी को बयां करती ,लेखक अजय मलकानी एवं सहयोगी एवं अजय मलकानी द्वारा निर्देशित युवा रंगमंच ,रांची झारखंड की प्रस्तुति “उलगुलान” ने स्वतंत्रता संग्राम के छिपे नायकों को मानो दर्शको के सामने लाकर खड़ा कर दिया हो।
मुंडारी भाषा में उलगुलान जिसका अर्थ होता है -क्रांति ।
सुरम्य नैसर्गिक छटाओं से परिपूर्ण झारखंड को समय समय पर अपने भावानुसार देखा और वैसा ही उसके साथ व्यहार किया,महाप्रभु चैतन्य ने इसे वृदाबन एवं श्याम के धाम के रूप में देखा,तो मुगलो ने रत्नगर्भा कहे जाने वाले झारखंड के खजाने पर नजरें रखी और उसे लूटा भी।
अफगान ,मुगल बादशाह और उसके लुटेरों द्वारा रोतासगढ़ को लूटना,जिसमे उरांव राजा उडगन ठाकुर की बेटी सिनगी दाईं और उसकी सखी कैली के नेतृत्व में औरतों की फौज ने मुगलो की सेना को दो बार हटाया, इससे इत्तेफाक कराती
उलगुलान ईस्ट इंडिया कम्पनी के शोषण से पहले के आक्रांताओं से लेकर दमनकारी अंग्रेजो द्वारा झारखंड पर किये अत्याचारों और उसके विरुद्ध हुए क्रांति की गाथा है।
सुनियोजित दृश्य एवं प्रकाश सज्जा तथा कसे संवाद तथा सुंदर संगीत से परिपूर्ण नाटक उलगुलान बाबा गम्भीरनाथ ऑडिटोरियम में बैठे दर्शको को स्वतंत्रता के उन हीरो से रूबरू करा गया, जिनमे से बहुतों को स्वतंत्र भारत के इतिहास के अंधेरे काल खंड में रख दिया गया था।
1765 ईसवी में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने शिकंजा कसते और कम्पनी शासन के साथ उसके द्वारा दमन के विरुद्ध शुरू हो गया था ,उलगुलान यानी क्रांति,झारखंड की आर्थिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर अंग्रेजो का कहर दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा था,फुट डालो राज करो कि नीति झारखंड की धरती पर भी फलने फूलने लगी, अपने ही अपनो के मौत के कारण बनने लगे, कमर तोड़ लगान जनता का खून चूसने लगी।
झारखंड का कोई विस्तृत या यूं कहें कि क्रमबद्ध इतिहास कम मिलने के बावजूद भी दमन के विरुद्ध ऐसी तमाम योद्धाओं और सेनानियों की गाथाओ को समेटने की गाथा उलगुलान नाटक नेपथ्य के नायकों का मानो सजीव दर्शन करा गया।
छोटानागपुर राज्य और इसकी राजधानी ‘सुतियाम्ये’ के प्रथम राजा ने मुण्डा जनजाति के मंदिरा मुण्डा के जनतांत्रिक कार्यशैली का बोलबाला था,
राज्य में प्रतिभा और श्रेष्ठता की पूछ थी यही कारण है कि उन्होंने अपने पोषित पुत्र नागवंशी बालक–फणिमुकुट राय को अपना उत्तराधिकारी बनाता है। मुण्डाओं के हाथ से नागवंशियों के
हाथों में लगभग 1500 वर्षों तक सुरक्षित रही। किन्तु बगावत, आक्रमण और सुरक्षित स्थान की खोज में बारम्बार राजधानी बदलती रहती है।
संथालो के शोषण,के विरुद्ध
उलगुलान हुल, क्रांति, विप्लव के नायक तिलका मांझी, (1785 ई0 भागलपुर).की हो ,या
बुद्ध भगत (1831-32, राँची), सिद्धू कान्हू (1855-56, दुमका संथाल परगना), ठाकुर विश्वनाथ
शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय, शेख भिखारी, टिकैत उमराँव सिंह, नीलाम्बर-पीताम्बर शाही,
जमादार माधव सिंह, जयमंल, नादिर अली (1857 प्रथम स्वतंत्रता इत्यादि और अंत में बिरसा मुण्डा सहित चर्च के पाखण्ड और अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध हुंकार भरता हुआ,
भारत माँ के अमर सपूतों के बलिदान की गाथा को समेटने की कोशिश करता यह नाटक ,”क्रांति एक सतत प्रक्रिया है” जो अनवरत चलटी रहेगी, इसका का संदेश दे गया। सिम्बोलिक शैली में निबद्ध , देश और इस भूमि के प्रति खुद के कर्तव्यबोध का एहसास है नाटक .. उलगुलान
चैतन्य महाप्रभु की भूमिका में-दीपक चौधरी,फादर और शोषक की भूमिका में शंकर पाठक, शहंशाह और शासक की भूमिका में संजय शर्मा ,खुफिया और तिलका मांझी की भूमिका मे जितेंद्र,कैप्टन की भूमिका में पंकज,कान्हू की भूमिका में पवन,गायन में सन्नी कुमार,जानवर की भूमिका में मुन्नू ,और अनमोल, सिपाही की भूमिका में सोनू, कैप्टन भारत ,सफेद फूल दिव्या गुप्ता, प्रकृति एवं दई मा की भूमिका में रही।
साथ मे आकांक्षा ,ऋतु ,आलोक,उपेंद्र संतोष ने पूरे नाटक को अपने अभिनय से जीवंत कर दिया।
खचाखच भरे दर्शको के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संस्था के अध्यक्ष श्री रविशंकर खरे ने निर्देशक अजय मलकानी को स्मृति चिन्ह देकर सभी कलाकारों के प्रति सम्मान प्रकट किया ।
संचालन मानवेन्द्र त्रिपाठी ने किया।




