*मोहर्रम में खास :  ढोल- ताशों की अहमियत पर मुर्तजा हुसैन रहमानी की रिपोर्ट*
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मोहर्रम के मौक़े पर ढोल-ताशा बजाना बरसों पुरानी रिवायत और तहज़ीब का हिस्सा रहा है। यह सिर्फ़ एक साज़ नहीं, बल्कि जुलूस की पहचान, इत्तेहाद और नज़्म-ओ-ज़ब्त (अनुशासन, प्रबंध और व्यवस्था) का पैग़ाम भी देता है। ढोल की गूंजती हुई आवाज़ और ताशों की पुरजोश लय जुलूस के आमद का ऐलान करती है और लोगों को उसके साथ जोड़ती है।
अखाड़ों के लाठी, बाना, बनैठी और दूसरे पारंपरिक फ़नून के प्रदर्शन में ढोल-ताशा अहम किरदार निभाता है। ढोल और ताशा के लय पर खिलाड़ी बेहतर तालमेल के साथ अपने हुनर का मुज़ाहिरा करते हैं, जिससे खेल की ख़ूबसूरती और असर अंगेज़ी में इज़ाफ़ा होता है।
ढोल-ताशा हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक अहम निशानी भी है। इसकी बदौलत सदियों पुरानी अखाड़ा संस्कृति और पारंपरिक फ़न ज़िंदा रहते हैं और नई नस्ल तक पहुंचते हैं। यह नौजवानों को अपनी तहज़ीब, इतिहास और रिवायतों से जोड़ने का बेहतरीन ज़रिया है।
बड़े जुलूसों में ढोल-ताशा न सिर्फ़ जोश पैदा करता है, बल्कि नज़्मो-ज़ब्त और इंतिज़ाम को भी मज़बूत बनाता है। इसकी एक मुक़र्रर लय के साथ जुलूस आगे बढ़ता है, जिससे शिरकत करने वालों में यकजहती और हमआहंगी क़ायम रहती है।
मोहर्रम के जुलूसों में ढोल-ताशा आपसी मोहब्बत, भाईचारे और इत्तेहाद की फ़िज़ा को भी मज़बूत करता है। यह लोगों को एक मंच पर लाकर सामाजिक रिश्तों को मज़बूती देता है और साझा सांस्कृतिक विरासत की हिफ़ाज़त का सबब बनता है।
बहरहाल, मोहर्रम का अस्ल पैग़ाम कर्बला के शहीदों की याद, हक़, इंसाफ़, सब्र और कुर्बानी के जज़्बे को ज़िंदा रखना है। ढोल-ताशा अगर तहज़ीबी और पारंपरिक अंदाज़ में बजाया जाए तो यह जुलूस की रौनक, पहचान और अखाड़ों की शानदार रिवायतों को बरक़रार रखने में अहम किरदार अदा करता है।

By Minhajalisiddiquiali

गोरखपुर up53 सीएम सिटी

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