गोरखपुर । अभिव्यक्ति की द्वैमासिक काव्य गोष्ठी में समस्त रचनाकारों द्वारा उत्कृष्टतम रचनाएँ पढ़ीं गईं । सभी ने एक स्वर से स्वीकार किया कि गोरखपुर में ऐसी समृद्ध गोष्ठियाँ 20-25 साल पहले होतीं थीं. उस्ताद शायर सरवत जमाल की सारस्वत अध्यक्षता एवं शशिविन्दु नारायण मिश्र के कुशल संचालन में आयोजित गोष्ठी की मेजबानी संस्थाध्यक्ष डा. जय प्रकाश नायक ने अपने चिलमापुर स्थित आवास पर की. इस दौरान सशक्त युवा रचनाकारों की प्रतिभा को विशेष रूप से सराहा गया एवं कार्यशाला भी आयोजित की गई । गोष्ठी में पठित रचनाओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं
नित्या त्रिपाठी ने काव्यक्रम की संजीदा शुरुआत की ‘दोहरी ज़िन्दगी जी रहे हैं सभी
मुस्कुराकर ज़हर पी रहे हैं सभी …’,रिंकी प्रजापति ने यथार्थ को नई कविता में ढाला ‘मनुष्य बनना बहुत कठिन है /
मनुष्य बनकर जीना /
उससे भी ज़्यादा कठिन है ।’,हास्य कवि जगदीश खेतान भी आज गम्भीर हो गए -‘मत करिहा तूँ कब्बो गुमान बबुआ!
एक दिन तोहरो निकरी परान बबुआ!’, निखिल पाण्डेय ने माहौल को ख़ूबसूरत बनाया -मेरा दिल भी है एक घर तेरा
तुझको अच्छा लगे तो आया कर। ,अरुण ब्रह्मचारी ने आत्मा के अंतिम सम्बोधन को निर्गुण में ढाला -मैं पिया जी के घर जा रही हूँ ,मुझको आँगन में ले करके आओ । डा. कनकलता ने प्रांजल गीत प्रस्तुति दी -एक आत्मवृक्ष लगाना होगा ,आशाओं की नवकोंपल को जीवन में अपनाना होगा ।,डा. अजय राय ‘अनजान’ ने बाज़ारीकरण पर चोट की -हर जगह तो शहर और बाज़ार है
दाम लाओ सही और फिर देखना
सारा सामान बिकने को तैयार है,विनोद निर्भय की ग़ज़ल ने वाहवाही बटोरी -दुनिया को रोशन करने की ख़ातिर सूरज को
सदियों से अपने को रोज़ जलाना पड़ता है ।,कृष्णा श्रीवास्तव ने हिंदी का सुन्दर यशगान किया -कबीरा, सूर, तुलसी से हुई धनवान है हिंदी ,रजत सोपान से जग में गुणों की खान है हिंदी शैलेन्द्र असीम ने बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल पढ़ी -उतरी है जो इन्द्रलोक से एक अप्सरा धरती पर षमहफ़िल-महफ़िल चर्चा में वो रहती है, मैं लिखता हूँ ,डा. चेतना पाण्डेय ने विभिन्न कोणों से गोष्ठी को ऊँचाइयाँ दी -मैंने इस ज़िन्दगी के वास्ते क्या-क्या न किया ,मुझी से ज़िन्दगी नखरे हज़ार करने लगी ,धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने गोष्ठी को समकालीन विशिष्टता प्रदान की -और /इन स्थितियों में / जिन्हें बोलना चाहिए था / चुप रह गए / जिन्हें चुप रहना चाहिए था / उन्हें बोलने की छूट दे दी गई । सृजन गोरखपुरी की ग़ज़ल ने गाँव के स्वर्णिम अतीत का पुन: आवाहन किया -चलो मिलकर पुकारें, लौट आएगा, यक़ीं मानो ,कभी सचमुच हमारे गाँव का मौसम गुलाबी था ।,डा. जय प्रकाश नायक के बहुचर्चित नवगीत ने गोष्ठी को मानक आयाम प्रदान किया -ऐसे टूटा मन, ज्यों टूटे दर्पण
रोज़ दशहरा है, रोज़ दिवाली है
अपहृत मर्यादा, कुटिया खाली है
दम्भ नहीं मरता, मरता है रावणषवीरेन्द्र मिश्र दीपक के गीत ने बाज़ार के फ़रेब की पर्तें खोली -सोनपरी! ओ मेरी सोनपरी!
फँसना मत बाज़ारू जाल में
क़दम-क़दम उग आए माल में,वरिष्ठ कवि सुभाष चन्द्र यादव ने ईश्वर को रचना सुमन अर्पित किए -अखिल विश्व का जो है स्वामी, जग का सृजनहार है
मैं तो हूँ आराधक उसका, जिसका यह संसार है ,अध्यक्षीय काव्यपाठ में उस्ताद शायर सरवत जमाल ने धारदार तंज करके अकबर इलाहाबादी की याद ताज़ा की -वफ़ादारी, नमक क्या चीज़ है, इंसान क्या जाने?
ये कुत्ते जानते हैं, आदमी का क्या भरोसा है?,गोष्ठी में रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, दिनेश गोरखपुरी आदि की विशेष उपस्थिति एवं बेचन सिंह पटेल का ख़ास सहयोग रहा । सचिव शशिबिन्दु नारायण मिश्र जी के पिता जी के निधन एवं डा. जय प्रकाश नायक की दिवंगत चाची को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई । संयोजक डा. नायक ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया । --

