इंसानों की रहनुमाई के लिए पैगंबर हजरत मुहम्मद का जन्म हुआ : मुफ्तिया कहकशां

प्यारे नबी से मुहब्बत करना ईमान का हिस्सा है : शहाना खातून

तुर्कमानपुर में मुस्लिम महिलाओं की संगोष्ठी

गोरखपुर। रविवार को मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में मुस्लिम महिलाओं की 23वीं संगोष्ठी हुई। अध्यक्षता ज्या वारसी ने की। संचालन सादिया नूर ने किया। कुरआन-ए-पाक कि तिलावत शिफा खातून ने की। नात-ए-पाक सना फातिमा, सानिया, खदीजा, शिफा, शिफा नूर, खुशी ने पेश की। पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की जिंदगी पर रोशनी डाली गई। आला हजरत इमाम अहमद रजा खां अलैहिर्रहमा के बारे में भी बताया गया।

मुख्य वक्ता मुफ्तिया कहकशां फिरदौस अमजदी ने कहा कि इंसानों की रहनुमाई के लिए 12 रबीउल अव्वल यानी 20 अप्रैल सन् 571 ई. में अरब के मक्का शहर में पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जन्म हुआ। वालिद का नाम हजरत अब्दुल्लाह था। वालिद का इंतकाल जन्म से पहले हो गया। जब आपकी उम्र 6 साल की हुई तो वालिदा हजरत आमिना का इंतकाल हो गया। जब आपकी उम्र 8 साल की हुई तो दादा हजरत अब्दुल मुत्तलिब का इंतकाल हो गया। जब आपकी उम्र 12 साल की हुई तो आपने मुल्के शाम का तिजारती सफर किया और 25 साल की उम्र में मक्का की एक इज्जतदार खातून हजरत खदीजा रदियल्लाहु अन्हा के साथ निकाह फरमाया और 40 साल की उम्र में एलाने नबुव्वत फारान की चोटी से फरमाया और 53 साल की उम्र में हिजरत की। आपने अल्लाह के पैगाम को पूरी दुनिया में पहुंचाया। आपका मजारे मुबारक मदीना शरीफ में है जहां पर आशिके रसूल जियारत कर फैज पाते हैं। पैगंबरे इस्लाम के कब्रे अनवर का अंदरूनी हिस्सा, जो आपके जिस्मे अतहर से लगा हुआ है वह काबा शरीफ व अर्श-ए-आजम से भी अफजल है।

महराजगंज की आलिमा शहाना खातून ने कहा कि अल्लाह इल्म-ए-दीन हासिल करने वालों से बेहद खुश होता है, इसलिए आपको चाहिए की इल्म-ए-दीन खुद भी हासिल करें और घर वालों को भी सिखाएं। नबी-ए-पाक हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमेशा अमन का पैगाम दिया। उनके अमन के पैगाम को जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है। प्यारे नबी की पूरी जिंदगी तमाम इंसानों के लिए आदर्श है। आप एक अच्छे रहबर, इंसान, आदर्श पिता, दोस्त, भाई तथा शौहर के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं जिनके आदर्श पर चलकर किसी भी व्यक्ति का जीवन सफल हो सकता है। प्यारे नबी से मुहब्बत करना ईमान का हिस्सा है। बिना नबी की मुहब्बत के कोई इबादत मकबूल नहीं होती। जब हम मुहब्बत का दावा करते है तो उसका इजहार भी जरूरी है शरीअत के दायरे में रहकर ‘जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी’ मनाना, जलसा करना, जुलूस निकालना खुशी के इजहार का एक तरीका है।

अंत में दरूदो सलाम पढ़कर मुल्क में खुशहाली, तरक्की व अमन की दुआ मांगी गई। महफिल में आस्मां खातून, नूरजहां शरीफी, सना, मुबस्सिरा, इनाया फातिमा, शबाना खातून, हदीसुन निशा, नूर अफ्शा, अख्तरुननिसा, असगरी खातून, सोहना आदि मौजूद रहीं।
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By Minhajalisiddiquiali

गोरखपुर up53 सीएम सिटी

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