गोरखपुर रंग महोत्सव में आज परिचर्चा के दौरान रंगमंच का अभिनेता और उसका भविष्य विषय पर बातचीत करने के लिए पूर्व निदेशक मध्य प्रदेश भोपाल संजय उपाध्याय और वार्ताकार के रूप में कला समीक्षक संपादक नदरंग आलोक पराड़कर रहे ।
इस दौरान संजय उपाध्याय ने सबसे पहले बिदेसियां पर चर्चा करते हुए कहा कि 1985 में बिदेसिया को तैयार कर लिया था और निर्माण कला मंच से हजारों बार मंचित हो चुका है । गत बीस वर्षों से इस पर पढ़ा रहे हैं और हर वर्ष बिदेसिया के ऊपर काम होता रहता है । 40 वर्षों से इस पर कार्य हो रहा है ।
उन्होंने कहा कि एक अभिनेता के लिए वाचिक आंगिक आहार और सात्विक अभिनय होना चाहिए । अभिनय का वसूल सात्विकता में है । लोक कलाकारों या गांव के कलाकारों के अंदर नैसर्गिक कला होती है और ऐसे कलाकारों को प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है । प्रशिक्षण के दौरान इस बात का ध्यान देना चाहिए कि मौलिकता खत्म ना हो । रंगमंच सामूहिक प्रदर्शनकारी कला है । नाटककार ने नाटक लिख दिया अब इस पर विमर्श चर्चा परिचर्चा होनी चाहिए । इसके केंद्र में अभिनेता होता है और जब यह अभिनय करेगा तो दर्शक खुद उस करेक्टर के अंदर अपने आप को ढूंढेगा और इसकी प्रतिक्रिया तुरंत आती है । नाटक तभी संभव है जब घटित होगा । इसमें सबकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । चरित्र निर्माण के लिए संगीत लाइट वेशभूषा आदि सब का योगदान होता है । अभिनेता नहीं है तो थिएटर नहीं होगा । उन्होंने कहा कि बदलाव हो रहा है पहले संगीत में मेलोडियस का जमाना था अब धीरे-धीरे आर्केस्ट्रा टाइप का हो गया है । पहले बड़े-बड़े संवाद हाथ फैला फैला कर बोले व अभिनय किये जाते थे लेकिन अब आधुनिकता में उस चरित्र को जीना है जो वास्तविक दिखे । आज नया युग आ गया है अब एक राजा की कहानी नहीं रह गई है । अब जनता नायक हो गया है एक जूता सिलने वाला भी यह सपना देख रहा है कि उसकी फैक्ट्री हो गई है । आगे उन्होंने कहा कि नाटक में अपने इमोशनको तोड़ते रहना चाहिए और इसके लिए प्रशिक्षित होना बहुत जरूरी है । हम नाटक कर रहे हैं सचमुच का नहीं कर रहे हैं इसका हमेशा ध्यान रहे ।
उन्होंने कहा कि कलाकार वही है जिसने मीरा का रोल किया और वापस अपने वास्तविक रूप में आ जाएं । नाटक में डूबना आत्मघाती हो सकता है । रंगमंच के अभिनेता का भविष्य के बारे में जब यह सवाल किया गया रंगमंच करना मतलब अपना घर फूंक कर तमाशा देखना है तो उन्होंने कहा रंगमंच का भविष्य है तभी रंगमंच हो रहा है । रंगमंच जिंदा है, सिर्फ जिंदा नहीं आगे बढ़ रहा है । रंगमंच हमारा अधिकार है हमारा पेसा है यह अब शौकिया नहीं है । जब यह स्थिति बनेगी तभी हम रोजी-रोटी की तलाश कर पाएंगे ।
उन्होंने कहा कि हिंदी रंगमंच का दुर्भाग्य यह रहा की ना हम जयशंकर प्रसाद के परंपरा को आगे बढ़ा पाए और ना ही भारतेंदु हरिश्चंद्र के परंपरा को आगे बढ़ा पाए । अभिनेता के लिए ढेर सारे अवसर आ गए हैं सिनेमा टीवी आदि । अच्छे और गुणी से गुणी अभिनेता भी हाईलाइट नहीं हो पता है जबकि एक सामान्य अभिनेता भी ब्रेड के साथ बटर खाने लगता है । रोटी, कविता जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । कला का स्रोत कविता है । बिना ट्रेनिंग के अभिनय नहीं कर सकते हैं चाहे इसे किसी इंस्टीट्यूट में लिया जाए या किसी अन्य प्लेटफार्म से लें , प्रशिक्षण जरूरी है । नाटक देखना जरूरी है सुनना जरूरी है सुनना व देखना नाटक के लिए व अभिनय के लिए बहुत जरूरी है । आम जीवन में व मंच पर हर आदमी अभिनय कर रहा है । आम जीवन में घटित घटनाओं को मंच पर रखते हैं आने वाले दिनों में अभिनय में लोगों को अवसर मिलने वाले हैं हर व्यक्ति को नाटक के किसी न किसी विधा से जुड़कर काम करना चाहिए । थिएटर करने से व्यक्ति इंसान बनेगा, बेहतर नागरिक बनेगा, नाटक बहुत जरूरी विधा है इस विधा का जिंदा रहना बहुत जरूरी है ।

