रोज़ा-नमाज़ के जरिए अल्लाह को राज़ी करने में जुटे रोजेदार-सातवां रोजा


गोरखपुर। रोजेदार रोज़ा-नमाज़ के जरिए अल्लाह को राज़ी करने में जुटे हुए हैं। माह-ए-रमज़ान का सातवां रोज़ा रोज़ेदारो ने सुब्हानअल्लाह, अलहम्दुलिल्लाह, अल्लाहु अकबर का विर्द करते हुए गुजारा। जब दुआ में हाथ उठा तो दिल से यही सदा निकली ‘या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो, जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो’। तरावीह की नमाज़ जारी है। बाजार में चहल-पहल है। दिन व रात खुशगवार है। घर व मस्जिद में कुरआन-ए-पाक पढ़ा जा रहा है। आखिरी पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, उनके घर वालों व उनके साथियों पर दरूदो सलाम पेश किया जा रहा है। घरों में महिलाओं की जिम्मेदारी बढ़ गई है। इफ्तार व सहरी में दस्तरख्वान बेहतरीन खानों से सजा नज़र आ रहा है। मस्जिदों में रमज़ान का दर्स चल रहा है। रहमत का अशरा जारी है। दस रोज़ा पूरा होने के बाद मग़फिरत का अशरा शुरु होगा। हाफिज अशरफ रज़ा इस्माईली द्वारा हिंदी में लिखित रमज़ान के मसाइल किताब घर-घर पहुंचाने का सिलसिला जारी है।
छह वर्षीय ताहिब ने मुकम्मल पढ़ा कुरआन, मिली दुआ
सूर्य विहार निवासी सैयद अब्दुल मतीन व नाज़िया वारसी के छह वर्षीय बेटे सैयद मो. ताहिब ने देखकर मुकम्मल कुरआन-ए-पाक पढ़ लिया है। एलकेजी में पढ़ रहे ताहिब ने शिक्षक वसीम की निगरानी में पूरा कुरआन-ए-पाक तकरीबन डेढ़ साल में मुकम्मल पढ़ा। इस मौके पर परिवार के लोगों ने तोहफों व दुआओं से नवाज़ा। ताहिब के माता पिता ने कहा कि हम बहुत खुश हैं। इतनी कम उम्र में मुकद्दस कुरआन को पूरा करना ताहिब के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। जो अल्लाह तआला के फज्ल से हासिल हुई है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने बच्चों को शिक्षा देने और उन्हें अच्छे अख़्लाक सिखाने का आदेश दिया है। हम भविष्य में ताहिब को उच्च दीनी व दुनियावी शिक्षा देने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे।
रोज़ा शिष्टाचार सिखाता है : मोहम्मद अहमद
गौसिया जामा मस्जिद छोटे काजीपुर के इमाम मौलाना मोहम्मद अहमद निज़ामी ने बताया कि रमज़ान के पवित्र माह में रोज़ा रखने से नसों में खून का दबाव संतुलित रहता है। यह सभ्यता और शिष्टता प्रदान करता है। रोज़ा के दौरान रक्तचाप सामान्य रहने से भलाई, सुव्यवस्था, आज्ञापालन, धैर्य और नि:स्वार्थता का अभ्यास भी होता है। रमज़ान के पवित्र माह में रोज़ा रखने से पाचन क्रिया और अमाशय को आराम मिलता है। सालों-साल लगातार काम करने के कष्ट से शरीर की इन मशीनरियों को कुछ दिनों तक आराम मिलता है। इस दौरान आमाशय शरीर के भीतर फालतू चीजों को गला देता है। यह लंबे समय तक रोगों से बचे रहने का एक कारगर नुस्खा है। उन्होंने बताया कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खजूर बेहद पसंद थी। खजूर में शिफा है। खजूर से रोज़ा खोलना पैग़ंबरे इस्लाम की सुन्नत है। खजूर जन्नत का फल है और इसमें जहर से भी शिफा है। खजूर खाने से न सिर्फ थकावट दूर होती है बल्कि गुर्दे की ताकत भी बढ़ती है।
रमज़ान में की गई इबादत बहुत असरदार : हाफिज सद्दाम
कलशे वाली मस्जिद मिर्जापुर में तरावीह की नमाज पढ़ा रहे हाफिज सद्दाम हुसैन निज़ामी ने बताया कि दीन-ए-इस्लाम में अक्सर आमाल किसी ने किसी रूह परवर वाकया की याद ताजा करने के लिए मुकर्रर किए गए हैं। रमज़ान में से कुछ दिन पैग़ंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गारे हिरा में गुजारे थे। इन दिनों में आप दिन को खाने से परहेज करते थे और रात को इबादत में मशगूल रहते थे। तो अल्लाह ने उन दिनों की याद ताजा करने के लिए रोज़े फ़र्ज़ किए ताकि उसके पैगंबर की सुन्नत कायम रहे। रोज़ा पिछली उम्मतों में भी था। मगर उसकी सूरत हमारे रोजों से जुदा थी। विभिन्न रिवायतों से पता चलता है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हर माह 13, 14, 15 को रोज़ा रखते थे। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम हमेशा रोजेदार रहते थे। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम एक दिन छोड़कर एक रोज़ा रखते थे। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक दिन रोज़ा रखते और दो दिन न रखते थे। रमज़ान के महीने में की गई अल्लाह की इबादत बहुत असरदार होती है। इसमें खान-पान सहित अन्य दुनियादारी की आदतों पर आदमी संयम करता है। आदमी अपने शरीर को वश में रखता है साथ ही तरावीह और नमाज़ पढ़ने से बार-बार अल्लाह का जिक्र होता रहता है जिसके द्वारा इंसान की रूह पाक-साफ होती है।
माहवारी आने से रोज़ा टूट जाएगा : उलमा किराम
उलमा-ए-अहले सुन्नत द्वारा जारी रमज़ान हेल्पलाइन नंबरों पर सोमवार को सवाल-जवाब का सिलसिला जारी रहा। उलमा किराम ने क़ुरआन व हदीस की रोशनी में जवाब दिया।
- सवाल : रोज़े की हालत में अगर हैज (माहवारी) आ जाए तो उसके लिए क्या हुक्म है? (मो. इस्लाम, सिधारीपुर)
जवाब : रोज़े की हालत में अगर मगरिब से पहले पहले किसी भी समय महिला को हैज आ जाए तो उसकी वजह से रोज़ा फासिद (टूट) हो जाएगा और पाक होने के बाद उस रोजे की कज़ा रखना लाज़िम है। (मुफ्ती अख्तर)
- सवाल : सदका-ए-फित्र कब निकालना चाहिए? (मो. आजम, रायगंज)
जवाब : ईद के दिन सुबह सादिक तुलू होते ही वाजिब होता है, लेकिन हो सके तो रमज़ान में ईद से कुछ दिन पहले ही निकाल लें ताकि ग़रीब हजरात भी अपनी जरूरियात पूरी कर ईद की ख़ुशी में शरीक हो सकें। (मुफ्ती मेराज)
