अल्लाह के आख़िरी पैग़ंबर हैं पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद : मौलाना तफज्जुल

‘महफिल-ए-मिलादुन्नबी’ का तीसरा दिन

गोरखपुर। ग्यारह दिवसीय महफिल-ए-मिलादुन्नबी के तीसरे दिन अक्सा मस्जिद शाहिदाबाद हुमायूंपुर उत्तरी में मौलाना तफज्जुल हुसैन रजवी ने कहा कि मुसलमानों को अल्लाह की तरफ से जो भी सौग़ात मिली है, वह पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सदके में ही मिली है। पैग़ंबर-ए-आज़म अल्लाह के नूर व आख़िरी पैग़ंबर हैं। पैग़ंबर-ए-आज़म को अल्लाह ने अपने नूर से पैदा फरमाया और पैग़ंबर-ए-आज़म के नूर से कायनात को बनाया। पैग़ंबर-ए-आज़म पर इंसान, जिन्न, फरिश्ते दरूदो-सलाम भेजते हैं। मुसलमानों के लिए रबीउल अव्वल शरीफ का महीना बहुत अहम है। इस महीने की 12 तारीख़ पैग़ंबर-ए-आज़म की पैदाइश का दिन है।

संचालन करते हुए हाफिज अजीम अहमद नूरी ने कहा कि जब-जब दुनिया में बुराईयां बढ़ती रहीं, तब-तब अल्लाह इंसानों की रहनुमाई के लिए नबी व रसूल (पैग़ंबर) भेजता रहा। पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसे जमाने में जन्म लिया, जब अरब के हालात बहुत खराब थे। बच्चियों को ज़िन्दा दफ़्न कर दिया जाता था। विधवाओं से बुरा सुलूक होता था। छोटी-छोटी बात पर तलवारें खिंच जाती जाती थीं। इंसानियत शर्मसार हो रही थी। ऐसे समय में इंसानों की रहनुमाई के लिए अरब के मक्का शहर में पैग़ंबर-ए-आज़म का जन्म हुआ। पैग़ंबर-ए-आज़म ने जब सच्ची तालीमात आम करनी शुरु कि तो उस दौर के मक्का में रहने वालों को काफी बुरा लगा। आपको तरह-तरह की तकलीफें दी गईं। जिसका आपने डट कर सामना किया। आपको मक्का से हिजरत करने पर मजबूर किया गया। आपने मदीना शरीफ में ठहराव पसंद किया। इतनी परेशानियों के बाद आपने मिशन को नहीं छोड़ा। आपने मजलूमों, गुलामों, औरतों, बेसहारा, यतीमों को उनका हक दिलाया।

अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमन सलामती की दुआ मांगी गई। महफ़िल में मो. कैफ़, हाफ़िज़ मो. आरिफ, बरकत हुसैन, हामिद रजा, मो. सिद्दीक, मो. शाहरुख, मो. हुसैन, तनवीर अहमद, मो. आरिफ, मुहर्रम अली, हम्माद रजा, साहिल रजा, मो. आज़म, मो. इस्लाम आदि लोग मौजूद रहे।

By Minhajalisiddiquiali

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