अच्छे कार्यों के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करें : कहकशां फिरदौस
तुर्कमानपुर में बुजुर्गों के अकीदे किताब पर ओपन बुक कॉम्पिटिशन व महिलाओं की संगोष्ठी
गोरखपुर। रविवार को मदरसा रजा-ए-मुस्तफा तुर्कमानपुर में बुजुर्गों के अकीदे किताब पर ओपन बुक कॉम्पिटिशन व महिलाओं की संगोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमें इस्लामी बहनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। तकरीबन पचास वैकल्पिक सवाल पूछे गए। एक घंटे के समय में इस्लामी बहनों ने सभी सवालों के जवाब दिए। इस्लामी बहनों ने बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाई गई असाइनमेंट फाइल भी जमा की। कॉम्पिटिशन का परिणाम जल्द ही घोषित किया जाएगा।
वहीं संगोष्ठी का आगाज कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुआ। छात्राओं ने नात व मनकबत पेश की। मुख्य वक्ता मुफ्तिया कहकशां फिरदौस ने कहा कि इस्लाम में आत्म-अवलोकन या आत्म-चिंतन व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास और अल्लाह के प्रति समर्पण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस्लाम में आत्म-सुधार सामूहिक विकास की कुंजी है। व्यक्ति को अपने कार्यों, विचारों और इरादों का लेखा-जोखा करना चाहिए। किताबों में लिखा है कि “इससे पहले कि तुम्हारा हिसाब (न्याय के दिन) लिया जाए, अपना हिसाब खुद कर लो”। ध्यान या सजगता निरंतर जागरूकता का नाम है कि अल्लाह हमेशा देख रहा है। यह हृदय की वह अवस्था है जहां व्यक्ति हर पल अल्लाह की उपस्थिति को महसूस करता है, जिससे उसके व्यवहार और नियत में सुधार आता है। इस्लाम में आत्म-अवलोकन का अंतिम उद्देश्य अहंकार या वासना को नियंत्रित करना और उसे शांत आत्मा की स्थिति तक ले जाना है।
उन्होंने कहा कि आत्म-अवलोकन से व्यक्ति के भीतर आत्म-संयम विकसित होता है। यह क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार जैसी भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है। व्यक्ति को सोने से पहले अपने दिन भर के कार्यों पर विचार करना चाहिए। अच्छे कार्यों के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करना और गलतियों के लिए तौबा करनी चाहिए। पांच वक्त की नमाज़ को एकाग्रता के साथ पढ़ना, जो एक प्रकार का दैनिक आत्म-अनुशासन है।
संचालन करते हुए शिफा खातून ने कहा कि इस्लाम में आत्म-अवलोकन का अर्थ है अपने विचारों, कार्यों और इरादों का ईमानदारी से मूल्यांकन करना, जो रूहानी विकास और अल्लाह के करीब जाने के लिए अनिवार्य है। यह आत्म-नियंत्रण, तौबा, और रोज़ाना की गलतियों को सुधारकर अपने चरित्र को बेहतर बनाने की एक निरंतर प्रक्रिया है। इस्लाम में आत्म-अवलोकन का मूल उद्देश्य खुद को जानना, अल्लाह के प्रति समर्पित होना, और आखिरत के लिए तैयारी करना है।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर पूरी दुनिया में शांति की दुआ मांगी गई। संगोष्ठी में ज्या वारसी, सना फातिमा, फिजा खातून, शालिबा, मुबस्सिरा, आस्मा खातून, नूरजहां, खुशी, फिजा खातून, सानिया, अदीबा, गुलफिशा सहित तमाम महिलाओं ने हिस्सा लिया।
