गोरखपुर  राज्य सरकार द्वारा कर्मचारियों के हित में समय-समय पर अनेक घोषणाएँ की जाती रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी अधिकांश मांगें फाइलों में ही दबी हुई हैं। वर्ष 2026 निकट है, इसके बावजूद वेतन, पेंशन, भत्ते एवं सेवा शर्तों से जुड़ी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं किया गया है। इससे राज्य कर्मचारियों में भारी रोष व्याप्त है।
राज्य कर्मचारी संगठनों का स्पष्ट कहना है कि—
पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल किए बिना कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
NPS/UPS कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुई है।
महंगाई के इस दौर में 50 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) को मूल वेतन में जोड़ने की मांग वर्षों से लंबित है।
60, 65, 70 एवं 75 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर मिलने वाली सुविधाओं को लेकर आज भी अस्पष्टता बनी हुई है और समान रूप से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है।
संगठन ने आरोप लगाया कि कर्मचारियों के चिकित्सा, आवास, एसीपी, पदोन्नति एवं सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक उदासीनता लगातार बनी हुई है। नियमों का सही ढंग से अनुपालन न होने के कारण कर्मचारियों को बार-बार मानसिक एवं आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कर्मचारी नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने शीघ्र ठोस निर्णय नहीं लिए तो कर्मचारी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष का मार्ग अपनाने को विवश होंगे। वर्ष 2026 से पूर्व सभी लंबित मांगों का समाधान अनिवार्य है, अन्यथा व्यापक आंदोलन की जिम्मेदारी पूरी तरह शासन-प्रशासन की होगी।
दीन दयाल कैशलेश इलाज योजना कागजों में, ज़मीनी हकीकत में कर्मचारी परेशान
इलाज के नाम पर जेब से भुगतान को मजबूर हैं राज्य कर्मचारी राज्य सरकार द्वारा कर्मचारियों के लिए लागू की गई प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजनाओं को कैशलेस बताकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। गंभीर बीमारी की स्थिति में भी कर्मचारियों से अस्पतालों द्वारा नकद धनराशि वसूली जा रही है, जिससे वे आर्थिक रूप से अत्यंत परेशान हैं।
राज्य कर्मचारी संगठनों का कहना है कि योजना में सूचीबद्ध अनेक अस्पताल कैशलेस इलाज देने से साफ इनकार कर देते हैं। मजबूरी में कर्मचारी निजी खर्च से इलाज कराते हैं और बाद में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लिए महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे न केवल मानसिक तनाव बढ़ रहा है, बल्कि कर्मचारियों के परिवारों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो रही है।
कर्मचारी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार की स्वास्थ्य नीतियाँ कागजों तक सीमित रह गई हैं। नीति और व्यवहार के बीच गहरी खाई है। गंभीर बीमारी की स्थिति में PM–CM स्वास्थ्य योजना सुरक्षा कवच बनने के बजाय बोझ साबित हो रही है।
संगठन की प्रमुख मांगें—
सभी सूचीबद्ध अस्पतालों में वास्तविक कैशलेस इलाज सुनिश्चित किया जाए।
योजना का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
कर्मचारियों की चिकित्सा प्रतिपूर्ति प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाया जाए।
वर्ष 2026 से पूर्व कर्मचारियों के स्वास्थ्य हित में ठोस एवं प्रभावी सुधार लागू किए जाएँ।
कर्मचारी संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही स्वास्थ्य योजनाओं को व्यवहारिक रूप से प्रभावी नहीं बनाया गया, तो राज्यव्यापी आंदोलनात्मक कदम उठाने के लिए कर्मचारी विवश होंगे। इस अवसर पर रूपेश कुमार श्रीवास्तव मदन मुरारी शुक्ल पंडित श्याम नारायण शुक्ल, राजेश सिंह, अनिल द्विवेदी, बंटी श्रीवास्तव, राजेश मिश्रा, अनूप कुमार, इंजीनियर सौरभ श्रीवास्तव, संतोष सिंह, मिथिलेश तिवारी सहित अनेक कर्मचारी नेता उपस्थित रहे।

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