अल्लाह को राजी करने का महीना है माह-ए-रमजान : मुफ्तिया शहाना
रमजान में अल्लाह की रहमत रूपी बारिश इंसान को पाक-साफ कर देती है : कारी मुहम्मद अनस
माह-ए-रमजान में कैसे करें इबादत विषय पर तुर्कमानपुर में महिलाओं की संगोष्ठी
गोरखपुर। ‘माह-ए-रमजान में कैसे करें इबादत’ विषय पर रविवार को मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में मुस्लिम महिलाओं की 29वीं संगोष्ठी हुई। कुरआन-ए-पाक कि तिलावत खुशी नूर ने की। हम्द व नात-ए-पाक सना फातिमा, नूर अक्सा, फातिमा, शिफा ने पेश की। अध्यक्षता ज्या वारसी ने की।
मुख्य वक्ता मुफ्तिया शहाना खातून ने कहा कि इस्लामी बारह महीनों में रमजान को सबसे ज्यादा अहमियत हासिल है, क्योंकि अल्लाह ने अपने बंदों के लिए रमजान में बेपनाह बरकत और रहमत अता की है। रमजान हर ऐतबार से खास है। रमजान इसलिए है कि बंदा परहेजगार (बुरे कामों से दूर रहने वाला) बन जाए। तकवा (अल्लाह पाक से डरते हुए बुराइयों से रुक जाना) अख्तियार कर ले, क्योंकि जब इंसान के अंदर डर पैदा हो जाता है तो वह हलाल व हराम की तमीज करने लगता है। रमजान में कोई शख्स किसी नेकी के साथ अल्लाह का करीबी बनना चाहे तो उसको इस कदर सवाब मिलता है गोया उसने फर्ज अदा किया। जिसने रमजान में फर्ज अदा किया उसको सवाब इस कदर है गोया उसने रमजान के अलावा दूसरे महीनों में सत्तर फर्ज अदा किए। यह एक ऐसा महीना है कि जिसमें मोमिन का रिज्क बढ़ा दिया जाता है। जो इसमें किसी रोजेदार को इफ्तार कराए तो उसके गुनाह माफ कर दिए जाते हैं और उसकी गर्दन जहन्नम की आग से आजाद कर दी जाती है। यह महीना बंदे को तमाम बुराइयों से दूर रखकर अल्लाह के करीब होने का मौका देता है। इस माह में रोजा रखकर रोजेदार न केवल खाने-पीने की चीजों से परहेज करते हैं बल्कि तमाम बुराइयों से भी परहेज कर अल्लाह की इबादत करते हैं।
विशिष्ट वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि रमजान के महीने में अल्लाह की रहमत रूपी बारिश इंसान को पाक-साफ कर देती है। रमजान के पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर खूब रहमतों की बारिश करता है। रमजान में 30 दिन तक इस बात की मश्क (अभ्यास) कराई जाती है कि जो काम तुम्हारे लिए जायज है, उसके लिए भी तुम खुद को रोक लो। तब इंसान यह महसूस करने लगता है कि जब मैं हलाल कमाई से हासिल किया गया खाना और पानी इस्तेमाल करने से खुद को रोक सकता हूं तो गलत काम करने से क्यों नहीं रोक सकता हूं। इंसान अक्सर यह सोचता है कि वह चाहकर भी खुद को गुनाह करने से रोक नहीं पाता, मगर यह उसकी गलतफहमी है। रमजान उसे इसका एहसास कराता है।
संचालन करते हुए शिफा खातून व सादिया नूर ने कहा कि रमजान के महीने में ही कुरआन-ए-पाक दुनिया में उतरा, लिहाजा इस महीने में तरावीह के रूप में कुरआन-ए-पाक सुनना बेहद सवाब का काम है। रमजान का महीना हममें इतना तकवा पैदा कर सकता है कि सिर्फ रमजान ही में नहीं बल्कि उसके बाद भी ग्यारह महीनों की जिन्दगी भी सही राह पर चल सके। पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मशहूर फरमान है कि जिसने ईमान के साथ सवाब की नियत से यानी खालिस अल्लाह की खुशनूदी हासिल करने के लिए रोजा रखा उसके पिछले तमाम गुनाह माफ फरमा दिए जाते हैं।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में खुशहाली, तरक्की व अमन की दुआ मांगी गई। संगोष्ठी में फिजा खातून, आस्मा खातून, सना, मुबस्सिरा, खुशी नूर, हदीसुन निसा, नूर अफ्शा, अख्तरुन निसा, असगरी खातून आदि मौजूद रहीं।
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