गोरखपुर साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति के बैनर तले देश के प्रख्यात मंच संचालक, हास्य-व्यंग्य कवि, शायर एवं पूर्वांचल के अनेकानेक कवियों-शायरों के प्रेरणास्रोत रहे स्व. बेखटक मिर्जापुरी की पुण्य तिथि पर प्रतिवर्ष की भाँति उनके सूर्य विहार स्थित आवास पर उनके पुत्र संजय शांतिप्रिय की विनम्र मेजबानी में एक अद्वितीय संस्मरण एवं काव्य संध्या का आयोजन किया गया. अध्यक्षता कर रहे डा. जय प्रकाश नायक ने कहा कि बेखटक जी के जीवन ने फर्श से अर्श तक का सफ़र तय करके एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है. वे न केवल हिंदी जगत के कवियों के मार्गदर्शक रहे बल्कि उर्दू जगत भी उनसे विशेष रूप से प्रेरित और प्रभावित था. प्रखर कवि-आलोचक श्रीधर मिश्र ने कहा कि गोरखपुर के कविता स्कूल के हेडमास्टर थे बेखटक जी और उनके स्कूल के विद्यार्थी विश्वविद्यालय के प्राचार्य भी थे. वरिष्ठ कवि धर्मेन्द्र त्रिपाठी ने भी इस तथ्य की पुष्टि की. मुकेश आचार्य ने कहा कि बेखटक जी काव्य भाषा और व्याकरण के ऐसे मर्मज्ञ थे जिनसे सबको लाभ मिलता था. प्रकाशक रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं के विधिवत प्रकाशन पर बल दिया. ग़ज़लकार सृजन गोरखपुरी ने बेखटक जी के चुनिंदा शे’र पढ़े –

किसी को शेर के पिंजरे में डालकर हँसना
यहाँ ये जश्न भी अक्सर मनाए जाते हैं

विभिन्न संस्मरणों के अलावा हिंदी-उर्दू-भोजपुरी के दो दर्जन कवियों ने अपनी सशक्त रचना प्रस्तुति द्वारा काव्य संध्या को यादगार बनाया –

डा. सरिता सिंह ने सुन्दर गीत को स्वर दिया –

भावी सुख की चिंताओं में दूर ख़ुशी से रहते हैं
मृगतृष्णा की चाहत में हम साथी व्यर्थ भटकते हैं

सृजन गोरखपुरी ने अपनी हिंदी ग़ज़ल में नये शे’र जोड़े –

तुम तो सबसे अच्छे हो लेकिन
तुमसे अच्छा भी हो सकता है

संचालन कर रहीं डा. चेतना पाण्डेय ने सचेत किया –

गरीब सबमें हैं, हर जाति में शोषक-शोषित
पीर पिछड़ा, दलित, बाभन नहीं समझती है

अरुण ब्रह्मचारी ने रस घोला –

बैठेगा भला कब तक बेकार अकेले में
एक बज़्म सजा लेगा फ़नकार अकेले में

हास्य कवि जगदीश खेतान की संजीदगी ने चकित किया –

सोते-जगते सुबह हो गई, करते-धरते शाम हो गई
बचपन गया, जवानी बीती, यूँ ही उम्र तमाम हो गई

मुकेश आचार्य ने काव्यक्रम को ऊँचाई दी –

मेरे साये में रहती थी रौनक कभी
आज तनहा हूँ सूखे शजर की तरह

वीरेन्द्र मिश्र दीपक ने भोजपुरी में तीक्ष्ण तंज किया –

काहे मुँह झुराइल बाटें, अब का चाहीं?
निम्मन दिनवा आइल बाटें, अब का चाहीं?

उस्ताद शायर शमीम शाहज़ाद ने दिलकश अन्दाज़ बयां किए –

उतरा जब वह पनघट से, प्यासे कितने
अपनी हथेली चुल्लू करना सीख गए

अध्यक्षीय काव्यपाठ में डा. जय प्रकाश नायक ने अपना चर्चित नवगीत पढ़ा –

मैं तो घबरा गया यह नदी देखकर
ख़ौफ़ में आ गया यह सदी देखकर

उपरोक्त के अलावा शशिविन्दु नारायण मिश्र, ओम प्रकाश पाण्डेय आचार्य, विनय मितवा, सत्यनारायण पथिक, डा. फूलचन्द प्रसाद गुप्त, प्रेमलता रसविन्दु, महमूद गोरखपुरी सहित अनेक कवियों-शायरों ने अपने संस्मरण के साथ रचना पाठ द्वारा काव्य संध्या को सुशोभित किया.

आभार ज्ञापन एवं सांध्य भोज का आयोजन मेजबान संजय शांतिप्रिय ने किया. - सृजन गोरखपुरी उपाध्यक्ष, अभिव्यक्ति

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